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शीघ्रपतन

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सम्भोग के समय तुरंत वीर्य का निकल जाना शीघ्रपतन कहलाता है। अत्यधिक स्त्री-प्रसंग, हस्तमैथुन, स्वप्नदोष, प्रमेह इत्यादि कारणों से ही यह रोग होता है। सहवास में लगभग 10-20 मिनट का समय लगता है लेकिन 3-4 मिनट से पहले ही बिना स्त्री को सन्तुष्ट किए अगर स्खलन हो जाए तो इसे शीघ्रपतन का रोग समझना चाहिए। जब यह रोग अधिकता पर होता है तो स्त्री से संभोग करने से पहले ही सम्भोग का ख्याल करने पर या कपड़े की रगड़ से

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स्वप्नदोष

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सोते समय दिन या रात कोई भी समय हो अपने मन में बुरे व गन्दे विचारों के कारण सोते समय स्वप्न में किसी सुन्दरी स्त्री को देखकर या अपनी कुसंगति का ख्याल आते ही अपने आप वीर्य निकल जाता है इसी को स्वप्नदोष कहते हैं। यदि स्वप्नदोष महीने में दो-तीन बार हो तो कोई बात नहीं किन्तु हर रोज़ या सप्ताह में दो तीन बार हो जाये तो यह रोग भी कम भयंकर नहीं है। यूं तो स्वप्नदोष प्रायः सोते

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हस्तमैथुन

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हाथ से अपने वीर्य को नष्ट करने को हस्थमैथुन कहते हैं, कुछ नवयुवक व किशोर गलत संगत में बैठकर, उत्तेजक फिल्मे देखकर या अश्लील पुस्तकें पढ़कर अपने मन को काबू में नहीं रख पाते तथा किसी एकान्त में जाकर सबसे आसान तरीका अपने ही हाथों से अपना वीर्य निकालने को अपनाते हैं उन्हें यह नहीं पता कि वे ऐसा काम करके अपनी जिन्दगी में जहर घोल रहे हैं जिसका परिणाम यह होता है कि इन्द्री निर्बल हो जाती है पतलापन,

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जीवन रत्न-वीर्य

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जवानी जीने का सबसे सुहावना समय है। कई नौजवान तो सीधे ही बचपन से बुढ़ापे की तरफ चले जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि जवानों की कीमत व जवानी का सच्चा आनन्द क्या है? अधिकतर नवयुवक गलत संगत के कारण अपने शरीर से स्वयं ही खिलवाड़ करते हैं तथा सही रास्ते से भटककर वे यौन सम्बन्धी अनेकों रोगो से घिरकर अपनी सुनहरी जिन्दगी को तबाह कर देते हैं। आजकल लगभग 75 प्रतिशत नौजवान किसी न किसी रूप से

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बचपन की भूल – जवानी का खून

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ईश्वर ने पुरूष को शक्तिशाली इंसान बनाकर इस संसार में इसलिए भेजा है कि वह नारी सौन्दर्य के समिश्रण से नई पौध लगाकर कुदरत का सौंपा काम पूरा कर सके दिन भर में इंसान को जो कष्ट और परेशानियां मिलती हैं वह उन सबको रात की विश्राम बेला में रति सुख के साथ भूलकर हर नई सुबह फिर से ताजा और चुस्त होकर अपना कार्य प्रारम्भ कर सके। उचित परामर्श एवं सलाह लिए बिना शादी परेशानी का कारण बन सकती

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सफल जीवन का महत्व

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पूरे संसार का चक्र स्त्री और पुरुष पर आधारित होता है। कोई भी बालक अपने बचपन की सीमा लांघकर जब व्यस्क होकर पुरुष कहलाने लगता है तो ही पुरुष की यही इच्छा होती है कि वह सुन्र स्त्री का पति बन सके और उसके साथ अपना गृहस्थ जीवन सुखमय बिताए तथा स्वस्थ व निरोग संतान उत्पन्न करके अपनी वंश बेल को आगे बढ़ाए मगर संसार में चन्द व्यक्ति ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो इस गृहस्थ सुख का आनन्द उठाने

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